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Sunday, June 15, 2008

स्व-निरीक्षण से प्रमाण तक

(१) स्व-निरीक्षण का मतलब है - अपने आप को देखना। मैं क्या करता हूँ, कैसे करता हूँ, क्यों करता हूँ, क्या चाहता हूँ, कैसे फल-परिणाम मुझे मिल रहे हैं, क्या मैं तृप्त हूँ? इन सब प्रश्नों के उत्तर स्वयं में तलाशने पर मैं निष्कर्ष पर आता हूँ - "मैंने अब तक जो कुछ भी किया, जैसे भी किया - उससे मुझे तृप्ति नहीं मिली।" इस बिन्दु पर आए बिना अध्ययन शुरू ही नहीं हो सकता।

(२) इस बिन्दु पर आने के बाद स्वाभाविक रूप से हम इस निष्कर्ष पर भी पहुँच जाते हैं - "मेरे जीने में तृप्ति पाने के लिए मुझे कुछ और समझने की ज़रूरत है।" इसके बाद यह बात आती ही है - "क्या समझें?, किससे समझें?"

(३) समझने के लिए सह-अस्तित्व-वाद मध्यस्थ-दर्शन एक प्रस्ताव के रूप में मिलता है। समझाने वाले का सान्निद्ध्य मिलता है। समझाने वाला स्वयं अपने तृप्त होने का सत्यापन करता है - तभी उससे समझने के लिए श्रद्धा बन पाती है।

(४) अध्ययन पूर्वक साक्षात्कार, बोध, और अनुभव होता है। जिससे अस्तित्व में दृष्टा बन जाते हैं। यह स्वयं में तृप्ति का निरंतर स्त्रोत बन जाता है। इस तरह अनुभव-मूलक विधि से तृप्त हो कर जीना बन जाता है।

(५) अनुभव मूलक विधि से विगत की मान्यताओं की समीक्षा होती है। हम जिसको सही मान कर के पहले चलते थे, उसको हम अब स्पष्ट देख पाते हैं - कहाँ तक वह सार्थक था? यह समीक्षा होने पर अपनी अनावश्यक्ताओं का हम अपने आप विसर्जन कर देते हैं।

(५) अनुभव मूलक विधि से जीने के हर आयाम में प्रमाण ही प्रवाहित होता है। कायिक, वाचिक, मानसिक और कृत, कारित, अनुमोदित भेदों से हम जो भी कर्म करते हैं, उनमें प्रामाणिकता बहने लगती है। व्यवहार में, कार्य में, उपकार में, आचरण में, व्यवस्था में - हम स्वयं-स्फूर्त अपनी तृप्ति को प्रमाणित करने लगते हैं।

यह पूरी यात्रा स्व-निरीक्षण से ही शुरू होती है। दूसरों को जांचने जायेंगे, तो बखेडे में ही पड़ेंगे। दूसरे अध्ययन में मेरे सहयोगी हो सकते हैं। लेकिन समझने की जिम्मेदारी मेरी ही है।

- बाबा श्री नागराज शर्मा के साथ संवाद पर आधारित (जनवरी २००७)
स्त्रोत: मध्यस्थ-दर्शन

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