Friday, 16 May, 2008

अनुभव पूर्वक मानव में स्वयं स्फूर्त विधि से नियंत्रण प्रमाणित होता है.

नियति का मतलब है - अस्तित्व में पदार्थावस्था से प्राणावस्था, और फ़िर जीवावस्था और ज्ञानावस्था का प्रकटन होना। हमारी धरती पर भी ऐसा ही हुआ है। पिछली अवस्था में अगली अवस्था का भ्रूण रहता है। अगली अवस्था पिछली अवस्था के लिए पूरक, और पिछली अवस्था अगली अवस्था के लिए अपनी उपयोगिता को सिद्ध करती है। अस्तित्व में ऐसी ही व्यवस्था है। इसी को नियति-क्रम कहा है। यह विकास की ओर सहज प्रवृत्ति सह-अस्तित्व पूर्वक ही हो सकती थी। अर्थात - यदि पदार्थावस्था आवेशित और संघर्ष या खींच-तान में होती - तो उससे विकास तो नहीं हो सकता था। आवेश या संघर्ष में ह्रास, और स्वभाव गति में विकास होता है। स्वभाव-गति से आशय अपने आप में एक व्यवस्था होना, अग्रिम विकास में प्रवृत्ति होना, और समग्र व्यवस्था में भागीदारी करना है। यही नियंत्रण का स्वरूप है। यदि स्वभाव-गति न हो - तो अनियंत्रण ही होगा। इस बात को हम तय कर सकते हैं।

मनुष्येत्तर संसार में नियति विधि से नियंत्रण (निश्चित आचरण की निरंतरता) प्रमाणित है। गाय अपने आचरण की निरंतरता को प्रमाणित करने के लिए नियति विधि से बाध्य है। उसमें सोच-विचार कर मुझे ऐसा ही आचरण करना है - इस तरह की बात नहीं है। पेड़-पौधों और मिट्टी-पत्थर आदि में तो कोई विचार-पक्ष होता ही नहीं है। जड़ प्रकृति में नियंत्रण उनके नियति-क्रम में अवस्थिति के अनुसार ही है। इसका मतलब - केवल इनके अस्तित्व में होने मात्र से ही ये अपनी व्यवस्था को प्रकाशित करने लगते हैं। मनुष्य ही इस सुंदर व्यवस्था को समझ सकता है, और समझ भी जाता है।

मनुष्य धरती पर नियति विधि से ही प्रकट हुआ है। मनुष्य में नियंत्रण लेकिन नियति-विधि से प्रमाणित नहीं हो पाया। इसका मतलब - मनुष्य अपने धरती पर होने मात्र से ही व्यवस्था में नहीं हो गया। मनुष्य में सोचने-समझने की faculties कल्पना-शीलता और कर्म-स्वतंत्रता के स्वरूप में प्रकट हुई। कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता मनुष्य में मौलिक हैं - जो जीवों में नहीं देखी जाती। इसके साथ ही मनुष्य में सुख की सहज-अपेक्षा है। हर मनुष्य सुख चाहता है - हर समय, बिना अपवाद के। सारा समय मनुष्य का सारा प्रयास सुखी होने के लिए ही है। इस लिए कल्पनाशीलता और कर्म-स्वतंत्रता का प्रयोग मनुष्य ने अपने नियंत्रित होने के अर्थ में किया। लेकिन इनके चलते जितने भी प्रयास हुए - चाहे वे मिलजुल के किए गए हों, या अकेले में - वे सफल नहीं हो पाये। जैसे साम्य-वाद मनुष्य के आचरण को नियंत्रित करने का ही प्रयास रहा। भक्ति-विरक्ति, तपस्या आदि भी मनुष्य के आचरण को नियंत्रित करने के ही प्रयास रहे। ये असफल हो चुके हैं - या इनकी सफलता का अभी तक कोई प्रमाण नहीं मिला है, इस बात में हम विश्वास कर सकते हैं। प्रमाण मनुष्य ही होगा - जिसका आचरण नियंत्रित हो चुका हो। ऐसा प्रमाण स्वरूप में प्रस्तुत होने वाला जीवंत-मानव एक भी आगे नहीं आया। आचरण को नियंत्रित करने के प्रयासों में एक प्रयास ( या अनुसंधान) मध्यस्थ-दर्शन का भी रहा। यह प्रयास सफल हो गया।

इस अनुसंधान से यह निकला - "मनुष्य का आचरण समझदारी पूर्वक नियंत्रित हो जाता है।" मध्यस्थ-दर्शन ने समझदारी को जीवन-ज्ञान, सह-अस्तित्व दर्शन ज्ञान, और मानवीयता पूर्ण आचरण के रूप में अध्ययन-गम्य बना दिया। इस समझदारी से मनुष्य स्वयं-स्फूर्त रूप से नियंत्रित होता है। यह मनुष्येत्तर संसार से भिन्न स्थिति है। बाकी अवस्थाओं में नियति विधि से नियंत्रण था। मनुष्य में अनुभव पूर्वक स्वयं स्फूर्त विधि से नियंत्रण प्रमाणित होता है। यही मनुष्य की मौलिकता है।

- मध्यस्थ-दर्शन पर आधारित मेरी यह प्रस्तुति एक विद्यार्थी की हैसियत से है।

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